चिंता एक काली दीवार की भांति चारों ओर से घेर लेती है, जिसमें से निकलने की फिर कोई गली नहीं सूझती. – प्रेमचंद

अपनी भूल अपने ही हाथ सुधर जाए तो यह उससे कहीं अच्छा है कि दूसरा उसे सुधारे. – प्रेमचंद

जब हम अपनी भूल पर लज्जित होते हैं, तो यथार्थ बात अपने आप ही मुंह से निकल पड़ती है. – प्रेमचंद

जीवन का वास्तविक सुख, दूसरों को सुख देने में हैं, उनका सुख लूटने में नहीं. – प्रेमचंद

अन्याय में सहयोग देना, अन्याय करने के ही समान है. – प्रेमचन्द

कर्तव्य कभी आग और पानी की परवाह नहीं करता. कर्तव्य-पालन में ही चित्त की शांति है. – प्रेमचंद

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